कविता


1 टिप्पणी:

  1. शायद इस समय जब फ़िक्रें शुन्याँ में चली गयीं है, और हर इंसान मशीन और मतलबी बन गया.
    उस वक़्त में इस जैसी केसी पत्रिका को देखकर दिल हे नहीं शायद चेहरा भी खिल उठता है.....
    ये शायद मेरी हकीक़त है जो इसे देखने के बाद पैदा हुयी.....
    -sALMAN rIZVI-

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